
BALKRISHNA IYER
blogs from DURG


लड़ाई, दलीलें, भावनायें और विचार समंदर के किनारे जाकर सोचता हूं ये अंतहीन किनारा ठीक मेरी लड़ाई की तरह है, खीझ भरी और अंतहीन लड़ाई. तपिश से सूखते पेड़ की फैलती सिमटती परछाई खुद के लिये बेकार ठीक मेरी दलीलों की तरह लंबी, छोटी, अस्थिर लगातार अपना असर खोती दलीलें. उभरी हड्डियों वाली छाती के खांसने कराह...
Posted on 25 January 2010 | 8:28 pm
Read postWAITING... - A painting by IMAN MALEKI (Iran) इंतजार लंबे पलों के बीच फुसफुसाकर समय बताती दिवाल घड़ी इंतजार में लिपटा हर सॆकंड उगाता है काले-काले, पसीने से सराबोर सवाल कानों को बींधती है कोई लौटी हुयी आवाज शायद किसी गुजरे हुये दिन से टकराकर उनींदे दिनो के बीच सूरज के उगने, चढ़ने और डूबने के बाद वो ढ...
Posted on 13 January 2010 | 8:22 am
Read postदौर अनिर्णित से शुरू होती है हर सुबह, और हर शाम अनिर्णित में डूब जाती है हर रोज शुरू होता है एक नया खिंचाव टूटने से ठीक पहले तक शिराओं में, ठीक वहीं बहते खून की सनसनाहट के नीचे एक जंगल है बियाबान, यहाँ रोज कुछ ज्यादा अकेला होते जाने के इस दौर में जी रहे हैं, हम पुरानी बातों, पुरानी चीजों और पुराने ल...
Posted on 9 January 2010 | 9:22 pm
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