
manish kumar yadav
blogs from mathura


चलता जा रहा हूँ इसी फिराक़ में शायद वो शहर-ए-आम मिल जाये जिन गलियों में कभी रहा करती थीं वो उनमें बीते पलों के कुछ निशां मिल जाएं घरौदें तो बिखर गए वक़्त के तूफ़ान में फिर भी उम्मीद यही है कि शायद वो मकान मिल जाये चलता जा रहा हूँ इसी फिराक़ में वर्षों से चलते आ रहे इस थके दिल को आराम मिल जाये जो पूरें न...
Posted on 16 April 2013 | 1:30 am
Read postमुझे पता है...ख़बर थी तुझसे मिलना ही खुशियों की सहर थी मुश्किल था तुझे पाना फिर भी ताउम्र तेरी चाहत रही कुछ कहने लगे थे की हूँ मैं अंधा या फिर एक बावला बन्दा ढूंढता रहा चंदा अमावस की रात में इसे मोहब्बत कहे या नादानी ग़र कहो मोहब्बत,तो मोहब्बत ही सही अब तक है आस तो नादानी भी नहीं तब भी तू थी वहीँ,और...
Posted on 22 January 2012 | 5:05 pm
Read postलहरें.... ये ज़िन्दगी ढूंढे अपना साहिल कोई किनारा..... अपनी मंजिल कभी चढ़ती,तो कभी उतरती लहरें.... ये ज़िन्दगी ....बेख़ौफ़ ,बेपरवाह तोड़े सारे पहरे क्या ज़िन्दगी है, इन मौजों की मिलेगा साहिल,या मिल जाएँगी भंवर में क्या ठिकाना ...किसको है पता ये ज़िन्दगी ले जायेगी कहाँ.....क्या दिखाएंगी लहरें.... ये ज़ि...
Posted on 31 December 2011 | 3:23 pm
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