
Shiv Kumar Sahil
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मेरी कल्पनाओँ से भी आगे जाकर घर है तेरा मैं तुझ तक कैसे पहंचु बता मेरे मन सदियाँ , मिलो चलने का सफर सदियाँ , तनहा गुज़रती रातें कहाँ लगता है मुमकिन कभी अपना हो मिलन दुनिया के बाज़ारों में तन के व्यापारों में कहाँ लगता है जिन्दा होगा अब कोई गम बेबफाई भरे किस्से है बफा की कस्मे है मेरे हिस्से में तेरे ह...
Posted on 22 December 2018 | 12:26 pm
Read postजब ईश्क़ की गहराई में उतरा देखा .... वहां सिर्फ रूह थी तुम्हारी जिसका कोई जिस्म ना था मै अपनी वासनाओँ के साथ सदियों कैद रहा तेरी रूह की गहराई में एक दिन अचानक आजाद हुआ लौटकर पाया मैने मेरी वासनाएँ रह गई कहीं वहीं तेरी रूह की क़ैद में अब जिस्म में मेरे भी रूह है फ़क्त वासनाओं से मुक्त कितनी बेहतर है यह...
Posted on 12 December 2018 | 1:25 pm
Read postक्यों डूबा है चाँद गहरी तन्हाई में सूरज जल रहा है किसकी बेबफाई में समंदर क्या छुपाए बैठा है गहराई में वख्त छोड़ता ही नहीं कुछ, अपनी परछाई में उम्र टूट कर गिर रही है किस खाई में ये बता दे खुदा क्या राज है तेरी खुदाई में उफ़..... क्या दिखाई देता है दिल तुम्हे अब भी उस हरजाई में क्या कहे दिल तुमसे साहिल...
Posted on 26 November 2018 | 4:21 pm
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