टिकुली जी, मुझे वे दोनों पोस्ट आपके ब्लोग में नहीं मिले। वे कहां हैं? अपने ब्लोग का पता देने के बजाए क्यों नहीं आप उन दोनों पोस्टों की कड़ियां यहां देतीं?
घरेलू हिंसा का विषय काफी विस्तृत हैं। उसमें कई प्रकार की हिंसा आती है, जिनमें से दो का आपने जिक्र किया है - अपने पियक्कड़ पति के हाथों पत्नी का पिटना और वैवाहिक जीवन में बलात्कार।
इनके अलावा घरेलू परिवेश में ये हिंसाएं भी खूब होती हैं -
- बच्चों पर हिंसा (जिसमें लड़कियों के साथ घर के सदस्यों (जिसमें पिता भी शामिल है) द्वारा बलात्कार)
- वृद्ध जनों के साथ हिंसा
- नौकरों के साथ हिंसा
- बहू पर सांस-ननद आदि द्वारा की जानेवाली हिंसा (जिसमें दहेज को लेकर बहू को परेशान करना भी शामिल है)
इस तरह घर जिसे अधिकांश साहित्य में और बातचीत में गौरव-मंडित किया जाता है, अनेक प्रकार की हिंसा का अड्डा बना हुआ नजर आता है।
इसका समाधान क्या हो? इसका जवाब आसान नहीं है।
घरेलू हिंसा का एक कारण हमारे समाज का पितृसत्तात्मक होना है। जिससे पुरुषों को अधिक अधिकार मिले हुए हैं और स्त्रियों से अपेक्षा की जाती है कि वे पुरुषों के अधीन रहें। पर आधुनिक शिक्षा और मूल्य पुरुष-स्त्री को बराबरी का दर्जा प्रदान करते हैं। इससे टकराव की स्थिति पैदा होतीहै।
दूसरा कारण है आर्थिक तंगी। इसी के चलते लड़कियो के प्रति पक्षपात किया जाता है और नौकरों का शोषण किया जाता है।
तीसरा कारण हमारे समाज में वृद्ध जनों की देखरेख के लिए कोई अलग व्यवस्था का न होना है, जिसके कारण उन्हें अपनी संतानों के परिवार के साथ रहना पड़ता है। यदि संतानों के पास पर्याप्त पैसा न हो, तो वे वृद्ध-जनों को बोझ समझने लगते हैं।
आजकल के अधिकांश घर भी पति-पत्नी और बच्चे को ध्यान में रखकर ही बनाए जाते हैं, इससे बड़ा परिवार हो, तो जगह की कमी के कारण भी परिवार जनों में तनातनी की स्थिति पैदा हो जाती है।
ऊपर से हमारे समाज में अनेक प्रकार की विषमताएं भी हैं, जिसके कारण भी लोगों में हिंसक वृत्ति पाई जाती है।