"इस बार के चुनाव में कुछ तो ख़ास है. ऐसा कुछ, जो पहले के किसी चुनाव में कभी नहीं रहा. वरना दो-दो दंगों की खड़ताल अचानक क्यों बजायी जाने लगी होती. एक दंगे को बारह साल बीत गये, दूसरे को तीस साल! खड़ताल आज बज रही है! तेरा दंगा मेरे दंगे से ज़्यादा गंदा था!...."
'लोकमत समाचार' में हर शनिवार को प्रकाशित मेरे कालम 'राग देश' को मैंने एक ब्लाॅग के रूप में ढालने की कोशिश की है, ताकि इस स्तम्भ में अब तक छपी पिछली टिप्पणियाँ भी पाठक देख सकें. ब्लाॅग अभी बनने की प्रक्रिया में ही है.