हिन्दी : राष्ट्र भाषा वरदान या अभिशाप?
दिल्ली में संपन्न एक कार्यक्रम में राजेन्द्र यादव ने हिन्दी के साहित्य को बोझ बताते हुए उसे फेंककर आगे बढ़ने की बात कही. क्या अपने अतीत से कटकर कोई भाषा जिन्दा रह सकती है? क्या हिन्दी का अतीत एसा है जिससे पीछ छुडाया जाए? हिन्दी की रोटी खा रहे और हिन्दी की वजह से जाने जा रहे लोगों को हिन्दी का अपमान करने का कोई अधिकार है? खुसरो, कबीर, सूर, तुलसी, मीरां, जायसी, देव, भूषण, पद्माकर आदि की तुलना में राजेन्द्र यादव का साहित्यिक कद और औकात क्या है? क्यों न राष्ट्र भाषा का अपमान करने और जन भावनाओं को आहत करने के लिए राजेन्द्र यादव माफी मांगें या उनपर केस किया जाए.