
रण-बीच चौकड़ी भर-भरकर, चेतक बन गया निराला था। राणा प्रताप के घोड़े से¸ पड़ गया हवा को पाला था। गिरता न कभी चेतक-तन पर¸ राणा प्रताप का कोड़ा था। वह दोड़ रहा अरि-मस्तक पर¸ या आसमान पर घोड़ा था।। जो तनिक हवा से बाग हिली¸ लेकर सवार उड़ जाता था। राणा की पुतली फिरी नहीं¸ तब तक चेतक मुड़ जाता था।। -- बकरों...
Posted on 28 June 2020 | 11:18 pm
Read postPosted on 10 August 2019 | 11:34 pm
Read postPosted on 10 August 2019 | 11:34 pm
Read post