
SJ
blogs from Somewhere down the road




खुली सड़क पर रात के अँधेरे में कमीज की बाहें मोड़ें, रबड़ की चप्पल पहन रास्ते के छोटे पत्थर को ठोकर मार चलते बेफिक्री का वो लम्हा ही कुछ और था कुछ बेमतलब की बातें, वो ज़ोरों के ठहाके सभी दोस्त और कुछ जो थे अपने चुटकुले, संवाद और अनगिनत बातें वो ज़िन्दगी के गाने [...]...
Posted on 8 February 2015 | 3:59 am
Read postदो पल भी खाली बैठा नहीं जाता हाथों में जैसे कुछ खुजली सी होती है आँखें धुंधलाती सी है, पंजे पसीजते से शारीर शिथिल हो कचोटता सा है तपती गर्मी में बिजली के बिना जैसे पसीने से बदन छटपटाता सा है, ठीक वैसे ही इस पल बिना किसी 'गैजेट' के, ये मस्तिस्क कुन्हरता - जुहँझलाता [...]...
Posted on 22 November 2013 | 5:01 am
Read postशाम को क्रिकेट खेल जब घर वापिस आया तो बदन पसीने से भीग रहा था कमीज़ की उधड़ी सिलाई और खुल गयी थी जून की भीषण गर्मी से ये बाहें कुछ झुलस सी गयी थीं और ज़ोरों की प्यास लगी थी कुछ ठंडा खाने की आस बड़ी थी बाहर आइस-क्रीम वाले की गाड़ी की तभी [...]...
Posted on 29 July 2013 | 7:35 pm
Read postरात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है! उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता, और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है। जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ? मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी चाँदनी में बैठ स्वप्नों [...]...
Posted on 17 January 2010 | 8:27 am
Read postकवि-सम्मेलन के लिए बन्यौ अचानक प्लान, काकी के बिछुआ बजे, खड़े है गए कान। खड़े है गए कान, 'रहस्य छुपाय रहे हो। सब जानूं मैं, आज बनारस जाय रहे हो। 'काका' बनिक व्यर्थ थुकायो जग में तुमने, कबहु बनारस की साड़ी नहिं बांधी हमने। हे भगवन, सौगंध मैं आज दिवाऊं तोहि, कवि-पत्नी मत बनइयो, काहु [...]...
Posted on 7 January 2010 | 6:02 pm
Read postतारकोल और बजरी से सना सड़क पर पड़ा है एक ऐंठा, दुमड़ा, बेडौल जूता | मैं उन पैरों के बारे में सोचता हूँ जिनकी इसने रक्षा की है और श्रद्धा से नत हो जाता हूँ || - सर्वेश्वरदयाल सक्सेना...
Posted on 4 January 2010 | 7:27 pm
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