
Nadeem
blogs from Delhi

तनहा खड़ा हूँ खुद के घर में / इमेज; hqwallbase.com न जाने कितनी बार लौटने का वादा करके फिर न लौटा मैं, आज जब लौटा हूँ तो तनहा खड़ा हूँ खुद के घर में, यूँ तो अक्सर मुझे आदत थी वादा करके ना आने की, आज आया हूँ तो पता चला के बहुत से लोग चले गए इस घर से,...
Posted on 28 September 2014 | 10:51 pm
Read postतमाशा है ज़िन्दगी, और उस तमाशे का, मैं कोई बन्दर सा हूँ, लोग आते हैं, चंद सिक्के उछलकर चले जाते हैं, और मैं उन सिक्कों को, समेटता रह जाता हूँ। गुज़र जाती हैं, मेरी ज़िन्दगी की, कुछ घड़ियाँ, यूँही उछलते कूदते, मगर जब शाम होती है, खुद को तनहा, किसी रस्सी से बंधा पाता हूँ, मैं सिक्को को समेटता रह जाता ह...
Posted on 25 June 2012 | 6:00 pm
Read postशाम ज़रा मुख़्तसर सी होकर, सिकुड़कर बैठी है, और मैं सोच रहा हूँ, शायद कुछ ज़िन्दगी के बारे में, पता नहीं मिलेगी भी मुझे, या फिर यूँही तन्हा, कुछ हसरतों को लिए, ज़िन्दगी को एक बोझ की तरह, जी कर ही रवानगी ले लूँगा. लोग कहते हैं, तू मायूसी मिटा देता है, जहाँ भी जाता है. मैं हँस देता हूँ, ये सोचकर, के मे...
Posted on 8 June 2012 | 9:04 pm
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